पद्मश्री प्रसून जोशी को मायानगरी की चकाचौंध भी उन्हें पहाड़ से नहीं कर सकी अलग

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डॉ० हरीश चन्द्र अन्डोला
प्रसून जोशी 16 सिंतबर 1971 को अल्मोड़ा नगर स्थित मोहल्ला स्यूनराकोट में जन्मे थे। साहित्य में इतनी रुचि के साथ ही प्रसून विज्ञान के भी अच्छे जानकार हैं। भौतिक विज्ञान में उन्हाने पोस्ट ग्रेजुएशन किया और फिर एमबीए भी किया। पढ़ाई पूरी होने के बाद उन्‍होंने अपने करियर की शुरुआत दिल्‍ली की ऐड कंपनी से की। उन्‍होंने 10 साल त‍क यहां पर नौकरी की। इसके बाद वो अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञापन कंपनी ‘मैकऐन इरिक्सन’ के कार्यकारी अध्यक्ष बन गए। इसी बीच वह ऐडगुरु बनकर उभरे। उनके कुछ विज्ञापनों के पंचलाइन ने उन्हें काफी नाम दिलाया।हालांकि उनका परिवार मूल रूप से अल्मोड़ा के दन्यां से ताल्लुक रखता है। साहित्य के प्रति लगाव उन्हें विरासत में मिली। उनके पिता डीके जोशी पीसीएस अफसर थे तो मां सुषमा जोशी लाेकगायिका। ऐसे में उन्हें संगीत और साहित्य का वातावरण बचपन से मिला। विरासत में मिली इस अनुपम भेंट को उन्होंने अपने हुनर से और संवारा और मात्र 17 साल की उम्र में अपनी पहली किताब लिख डाली। किताब थी ‘मैं और वो’।प्रसून ने एक बार कहा था- प्रकृति अद्भुत है। यह हमें आपको संघर्ष करना सिखाती है। चुनौतियों से निपटने की प्रेरणा देती है। पहाड़ी जीवन जी चुके वह बताते हैं कि जटिल भूगोल वाले पहाड़ का जीवन आसान नहीं होता, मगर पर्वतीय वादियों में अध्यात्म की अनुभूति ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। यहां से सीखे संघर्ष ने ही उन्हें जीवन जीने की प्रेरणा दी और वह अंतरराष्ट्रीय फलक पर चमकने लगे। 2017 में उन्हें सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (का चेयरमैन बनाया गया। वह अब भी इसी पद पर हैं। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष होने के साथ प्रसून McCann World के सीईओ भी हैं। इसी McCann World कंपनी ने मेक इन इंडिया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी कैंपेन और जिंगल्स को डिजाइन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 17 अप्रैल 2017 को लंदन में ‘भारत की बात सबके साथ’ कार्यक्रम के जरिए दुनिया को संबोधित किया। इसी दौरान गीतकार प्रसून जोशी ने उनका दो घंटे 20 मिनट तक इंटरव्यू लिया। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सबसे लंबा इंटरव्यू लेने वाले कवि और लेखक हैं। मगर साहित्य से जबर्दस्त लगाव व प्रकृति प्रेमी प्रसून अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। मायानगरी की चकाचौंध भी उन्हें पहाड़ से अलग नहीं कर सकी है। यही वजह है कि उनके लेख हों या विज्ञापन उनमें उत्तराखंड के पहाड़ की झलक जरूर मिलती है। खास बात कि पहाड़ का रुख करने पर वह कुमाऊंनी बोली से लोगों के बीच अलग ही पहचान बनाए रखते हैं। पद्मश्री प्रसून की बातों में अक्सर प्रकृति प्रेम खूब झलकता है। ‘ठंडा मतलब कोकोकोला’ विज्ञापन उन्होंने ही बनाया। इसमें पहाड़ की शीतलता को उन्होंने दर्शाया। करीब एक दशक पूर्व अल्मोड़ा प्रवास के दौरान उन्होंने विचार साझा किया प्रकृति अद्भुत है। वह हमें आपको संघर्ष करना सिखाती है। चुनौतियों से निपटने की प्रेरणा देती है। पद्मश्री प्रसून मानते हैं कि जटिल भूगोल वाले पहाड़ का जीवन आसान नहीं होता। मगर पर्वतीय वादियों में अध्यात्म की अनुभूति ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया। प्रकृति प्रेम के साथ ही लोक संस्कृति से लगाव की प्रेरणा उन्हें विरासत में मिली। इसमें उनकी जननी की बड़ी भूमिका रही। उनसे मुलाकात के दौरान साहित्य जगत, प्रकृति और उनके विज्ञापन एवं शब्दावली में पहाड़ प्रेम पर चर्चा का हवाला देते हुए वरिष्ठ संस्कृति कर्मी बताते हैं कि पद्मश्री प्रसून के माता पिता शिक्षाविद् रहे। साहित्य की समझ उन्हीं से मिली। मां तो उन्हें कविवर सुमित्रानंदन पंत की कविताएं सुनाया करती थीं। पद्मश्री प्रसून जोशी ने एक बार युगपुरुष स्वामी विवेकानंद की हिमालय पदयात्रा पर बनी डॉक्यूमेंट्री देखी। उसमें अल्मोड़ा से कुछ दूर आध्यात्मिक स्थल कसारदेवी मंदिर का जिक्र था। युगनायक ने यहां चट्टान पर ध्यान लगाया था। पद्मश्री प्रसून के लिए यह सुखद अनुभूति थी। दरअसल, प्रकृति के करीब, पहाड़ में अध्यात्म से सीधा साक्षात्कार उन्हें भी होता आया है। प्रशून जोशी की तीन पुस्तकें भी प्रकाशित हुई है। बॉलीवुड की नामी फिल्में जैसे कि दिल्ली 6’, ‘तारे ज़मीन पर’, ‘रंग दे बसंती’, ‘हम तुम’ और ‘फना’ के लिए उन्होंने कई सुपरहिट गाने लिखे हैं। फ़िल्म ‘लज्जा’, ‘आंखें’, ‘क्योंकि’ में संगीत दिया है। ‘ठण्डा मतलब कोका कोला’ जैसे प्रचलित विज्ञापनों के कारण उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता भी प्राप्त हुई है। मगर उत्तराखंड में जन्मे प्रसून आज भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। उनकी लेखनी में पहाड़ और प्रकृति की झलक अक्सर दिखाई देती है। इसीलिए आज उत्तराखंड सरकार उन्हें उत्तराखंड गौरव के सम्मान से नवाजने जा रही है। सम्मानित प्रसून जोशी को दो बार सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला है। यही नहीं, स्वच्छ भारत मिशन का थीम सांग उन्होंने ही लिखा है उत्तराखंड का लोकगीत संगीत व रंगमंच मे उच्च स्थान है। नाटकों का इतिहास स्मृद्ध रहा है। लोकनाट्य असिमित हैं। समय-समय पर आयोजित कार्यकर्मो से यह सब सिद्ध भी होता रहा है। वर्तमान मे जरुरत है इन्हे निष्ठा, ईमानदारी व तत्पर रह कर आगे बढाने की। समृद्ध करने की। जिस हेतु केंद्र व राज्य सरकार को उत्तराखंड की लोकसांस्कृतिक समृद्धि हेतु स्थापित सांस्कृतिक संस्थाओं, कलाकारों व साहित्य सृजन कर रहे रचयिताओं की उन्नति हेतु उच्च स्तर पर नीति बनाकर उसे धरातल पर उतार, दृष्टिगत करने की दरकार है।

लेखक वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं।

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